हर क़दम पर सुरक्षाबलों को तैनात किया गया था. पूरी कश्मीर घाटी में सोमवार यानी पांच अगस्त को कर्फ्यू लगाया गया था.
अगले दिन हम उत्तरी कश्मीर के बारामूला के लिए सुबह साढ़े छह बजे निकले.
श्रीनगर से बारामूला की यात्रा एक घंटे की है. इस यात्रा के दौरान हमें सुरक्षाबलों और पुलिस ने हर एक किलोमीटर पर रोका.
आगे जाने की वजह पूछी. हर बार हमने कहा कि हम पत्रकार हैं और इसके बाद हमें आगे जाने दिया गया.
बारामूला
पहुंचकर हम पुराने शहर गए. वहां भारी संख्या में सुरक्षाबल तैनात थे. एक
दो अधिकारयों ने हमारा पहचानपत्र माँगा और जिसके बाद हमें कैमरा खोलने की
इजाज़त मिली. उन अधिकारियों ने हमसे चाय के लिए भी पूछा.
शूट ख़त्म करने के बाद हम एक दूसरे मोहल्ले में गए और आम जनता से बात करने की कोशिश
की. पहले तो कोई आम इंसान हमसे बात करने के लिए तैयार नहीं हुआ.
काफ़ी मशकत के बाद दो आम लोगों ने हमसे बात की.
मीडिया के साथ बात न करने की वजह डर था. कई लोगों ने हमसे कहा कि कैमरे
पर बात करने का मतलब है कि शाम को हमें गिरफ्तार कर लिया जाएगा. हमने लोगों
में काफ़ी डर पाया.
श्रीनगर वापस लौटने पर हमें उसी तरह से रोका गया, जिस तरह आते समय जगह-जगह रोका गया था.
अगले दिन सवेरे सात बजे हम दक्षिणी कश्मीर के लिए रवाना हुए. अनंतनाग कस्बे तक पहुंचने के दौरान कई जगहों पर हमें रोका गया.
जब हम अनंतनाग कस्बे पहुंचे तो हर तरफ सुरक्षाबल और पुलिस मुस्तैदी के साथ खड़े थे.
हम सीधा अनंतनाग के ज़िसा अस्पताल पहुंचे. यहां पहुंचकर हमने अस्पताल के कर्मचारियों से जानकारी हासिल की.
हमें बताया गया कि बीते दो दिनों में यहां कोई ऐसा ज़ख़्मी नहीं लाया गया है, जो बंदूक़ की गोली या पैलेट गन का निशाना बना हो.
अस्पताल
से लौटने के बाद जब हम आगे बढ़े तो जम्मू और कश्मीर पुलिस के विशेष दस्ते
के लोगों ने हमारी गाड़ी रोकी और आगे जाने नहीं दिया.
उन्होंने हमसे कर्फ्यू पास मांगे. हमने उनसे कहा कि सरकार तो कह रही है कि कर्फ्यू तो है ही नहीं. लेकिन वो अपनी ज़िद पर अड़े रहे.
हमने
किसी तरह वहां से अपनी गाड़ी पीछे मोड़ी और एक पतली गली से निकलकर हाइवे
पर पहुंच गए. डर के मारे हमने किसी जगह अपना कैमरा नहीं खोला.
दोपहर तक हम श्रीनगर वापस पहुंच गए. वापसी पर भी वैसे ही रोका गया जैसे आते समय.
वापसी पर अवंतीपोरा के पास सीआरपीएफ़ के दो जवानों ने हमारी गाड़ी को रुकने के लिए कहा.
हमारे साथी आमिर पीरज़ादा आगे की सीट पर बैठे सिगरेट पी रहे थे. जब ड्राइवर ने
गाड़ी रोकी तो सीआरपीएफ़ के एक अधिकारी ने आमिर से गुस्से में कहा, "सिगरेट
पीते हो, बाहर आओ."
आमिर ने फ़ौरन सिगरेट फेंक दी और मैंने बीच में दखल देकर मामले को सुलझा दिया.
नौ अगस्त को जब सौरा में प्रदर्शन हुए तो अगले दिन आमिर पीरज़ादा और मैं सौरा के लिए निकले.
सौरा के नज़दीक पहुंचकर दर्जनों नौजवानों ने रास्ता बंद किया था. किसी गाड़ी को आगे बढ़ने की इजाज़त नहीं थी. जब हम जब भीड़ के पास पहुंचे तो कुछ
नौजवान हमारी गाड़ी के पास आए और वापस जाने के लिए कहा.
हमारी गाड़ी पर बीबीसी का स्टीकर भी लगा था लेकिन वो नहीं माने.
एक नौजवान ने तो गरजती आवाज़ में हमसे कहा कि अगर आपने कैमरा खोला तो आपका कैमरा तोड़ दिया जाएगा.
कुछ
सेकेंड तक जब ड्राइवर ने गाड़ी नहीं मोड़ी तो एक नौजवान हमारी गाड़ी के
बोनट पर ज़ोर से मुक्का मारा और ड्राइवर से कहा कि फ़ौरन गाड़ी को मोड़ दो.
इतने में मैं और आमिर गाड़ी से नीचे आए और भीड़ से ऑफ़ द कैमरा बात करने लगे.
एक शख़्स ने हमसे कहा कि हम तो ईद का इंतज़ार कर रहे हैं. उनका कहना था कि ईद के बाद देखिए क्या होता है.
वहां
से निकलकर हम एक दूसरे रास्ते से जाने की कोशिश करने लगे. जब हम उस रास्ते
पर पहुंचे तो सुरक्षाबलों ने आगे जाने से रोका. और उस दिन हम सौरा जाने में नाकाम हो गए.